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इंदौर के उर्दू स्कूलों में हिंदी-संस्कृत शिक्षकों की तैनाती बनी शिक्षा में बाधा


Best Indore News: मध्य प्रदेश की शैक्षणिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर से एक हैरान कर देने वाली खबर सामने आई है। शहर के कई शासकीय उर्दू स्कूलों में हिंदी और संस्कृत विषय के शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई है, जबकि इन स्कूलों में सभी विषय उर्दू भाषा में पढ़ाए जाते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि जिन छात्रों को उर्दू माध्यम में पढ़ाई करनी थी, वे या तो विषय के शिक्षक के अभाव में पढ़ाई से वंचित हो रहे हैं या फिर उन्हें ऐसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं जिनका उनके सिलेबस से कोई संबंध नहीं है।

नियुक्ति में हो रहा है रसूख का दुरुपयोग

मध्य प्रदेश स्थानीय सूत्रों और अभिभावकों की शिकायतों के अनुसार, कई हिंदी और संस्कृत विषय के शिक्षक अपने रसूख का उपयोग कर उर्दू माध्यम के स्कूलों में पदस्थापना ले लेते हैं। यहाँ आने के बाद वे जानते हैं कि उन्हें पढ़ाने की बाध्यता नहीं है, क्योंकि स्कूल की भाषा, पाठ्यक्रम और छात्रों की जरूरत उनके विषय से मेल नहीं खाती। परिणामस्वरूप, वे दिनभर विद्यालय में आराम करते हैं और समय पूरा होते ही घर चले जाते हैं।

छात्रों के भविष्य पर असर

इन स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग से आते हैं। उर्दू माध्यम ही उनकी पढ़ाई का एकमात्र सहारा है। लेकिन जब उनके लिए निर्धारित विषयों के शिक्षक ही नहीं मिलते, तो शिक्षा की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है। कई छात्र समझ ही नहीं पाते कि उन्हें हिंदी और संस्कृत पढ़ाई क्यों जा रही है, जबकि बोर्ड परीक्षा में उनकी भाषा उर्दू है।

स्कूल प्रशासन मौन, शिक्षा विभाग भी उदासीन

शहर के कुछ उर्दू स्कूलों के प्राचार्यों ने इस स्थिति को लेकर शिक्षा विभाग से लिखित शिकायत भी की है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई है। कुछ स्कूलों ने इस समस्या को लेकर नगरीय प्रशासन एवं शिक्षा मंत्री तक बात पहुँचाने का प्रयास किया है, लेकिन अब तक जवाब नहीं मिला है।

एक वरिष्ठ शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “यह सिस्टम की खामी है। शिक्षक तबादला लेकर उर्दू स्कूल में इसलिए आते हैं क्योंकि यहाँ अपेक्षाकृत कम कार्यभार है। लेकिन इसका खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है।”

कई स्कूल जहां हिंदी माध्यम के शिक्षकों की कमी

इंदौर के विजय नगर, बाणगंगा आदि क्षेत्र में कई ऐसे शासकीय स्कूल हैं, जहां शिक्षकों की कमी है। बावजूद इसके उर्दू स्कूलों में आराम कर रहे शिक्षकों को पढ़ाने के लिए यहां नहीं भेजा जा रहा है।

कई बार हो चुकी शिकायत

उर्दू स्कूलों में हिंदी और संस्कृत माध्यम के शिक्षकों के स्थानांतरण के संबंध में पालक संघ ने कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी को कई बार शिकायत की है। विद्यार्थी भी अपने स्तर पर स्कूलों के प्राचार्य समस्या बता चुके हैं। फिर भी निराकरण नहीं हुआ है। विद्यार्थियों ने बताया कि उर्दू स्कूलों में गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान ऐसे विषय भी उर्दू में पढ़ाए जाते हैं। इस कारण हिंदी भाषा के शिक्षक नहीं पढ़ा पा रहे हैं।

समाधान की मांग

अभिभावकों, सामाजिक संगठनों और उर्दू भाषा से जुड़े शिक्षाविदों ने सरकार से मांग की है कि:

  • उर्दू स्कूलों में केवल उर्दू भाषी योग्य शिक्षक ही नियुक्त किए जाएं।
  • गैर-उर्दू विषय के शिक्षकों की अनुचित पदस्थापना पर रोक लगाई जाए।
  • ऐसे शिक्षकों की जिम्मेदारी तय की जाए जो स्कूल में रहते हुए भी शिक्षण कार्य नहीं करते
  • बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट और निरीक्षण प्रणाली को सख्त बनाया जाए।

इंदौर जैसे शिक्षित शहर में उर्दू माध्यम के छात्रों को उनके अधिकारों से वंचित किया जाना न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह शिक्षा की समावेशी नीति पर भी सवाल खड़े करता है। यदि सरकार और शिक्षा विभाग ने जल्द ही इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो यह उर्दू स्कूलों के भविष्य और वहाँ पढ़ रहे हजारों छात्रों के जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

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