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CM मोहन यादव की खुली चुनौती: दम है तो मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि के समर्थन में हलफनामा दे कांग्रेस

MP News:Open challenge of CM Mohan Yadav:

MP News: मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह विवाद को लेकर कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए एक खुली चुनौती दी है। उन्होंने कांग्रेस से पूछा है कि अगर उनमें दम है, तो वे इस मामले में अदालत में जाकर साफ-साफ हलफनामा दायर करें और बताएँ कि वे श्रीकृष्ण जन्मभूमि के समर्थन में हैं या नहीं।

मध्यप्रदेश: यह बयान उस समय आया जब देश में धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों पर राजनीतिक और सामाजिक बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। राम जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ के बाद अब मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मस्थान मामला भी न्यायालय में लंबित है और इस पर विभिन्न पक्षों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

मुख्यमंत्री मोहन यादव का बयान

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान कहा,

“अब समय आ गया है कि कांग्रेस को अपना स्टैंड साफ करना चाहिए। अगर दम है तो कांग्रेस मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान के समर्थन में अदालत में हलफनामा दे। केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए धर्म और आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं चल सकता।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत में सनातन आस्था और धर्म को लेकर लोगों की भावनाएं बहुत प्रबल हैं। राम मंदिर का निर्माण जनभावना की जीत का प्रतीक है और अब यही भावना मथुरा में भी जागृत हो रही है।

कानूनी पृष्ठभूमि: क्या है मथुरा विवाद?

मथुरा में स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद के बीच भूमि को लेकर विवाद दशकों पुराना है। हिंदू पक्ष का कहना है कि यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण का वास्तविक जन्मस्थल है और मुग़ल काल में एक मंदिर को तोड़कर वहाँ मस्जिद बनाई गई।

हालांकि, 1968 में एक समझौता हुआ था जिसमें दोनों धार्मिक संस्थानों के बीच सीमांकन किया गया था। लेकिन हाल के वर्षों में कई याचिकाएँ दाखिल की गई हैं, जिनमें इस समझौते को अवैध और असंवैधानिक बताया गया है। यह मामला अब मथुरा की अदालत में विचाराधीन है।

भाजपा की रणनीति या आस्था का समर्थन?

मुख्यमंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देशभर में चुनावी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस मुद्दे को चुनावी रणनीति के तहत फिर से उभारने की कोशिश कर रही है। हालांकि मुख्यमंत्री मोहन यादव ने साफ कहा कि,

“यह आस्था का विषय है, न कि चुनावी मुद्दा। भगवान श्रीकृष्ण केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक चरित्र नहीं हैं, वे हमारी सांस्कृतिक चेतना के केंद्र में हैं।”

कांग्रेस की चुप्पी पर सवाल

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि कांग्रेस आज तक मथुरा और काशी जैसे धार्मिक मामलों पर दोगली नीति अपनाती आई है। जब-जब सनातन धर्म से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं, कांग्रेस या तो चुप्पी साध लेती है या अप्रत्यक्ष रूप से विपक्षी रुख अख्तियार करती है।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर कांग्रेस वास्तव में धर्मनिरपेक्ष है और सभी धर्मों का सम्मान करती है, तो उसे श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मसले पर खुलकर समर्थन करना चाहिए

विपक्ष की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद कांग्रेस की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेताओं ने इसे भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति करार दिया है। उनके अनुसार, इस तरह के मुद्दों को उठाकर जनता के वास्तविक मुद्दों जैसे बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याओं से ध्यान भटकाया जा रहा है।

क्या बोले धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधि?

विष्णु मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष आचार्य रामेश्वर शास्त्री ने मुख्यमंत्री के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि,

“यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है। समय आ गया है कि मथुरा की धरती पर भी श्रीकृष्ण मंदिर पुनः भव्य स्वरूप में स्थापित हो।”

वहीं मुस्लिम संगठनों की तरफ से संयमित प्रतिक्रिया आई है, जिनका कहना है कि न्यायालय का निर्णय सर्वोपरि होगा और सभी पक्षों को उसे स्वीकार करना चाहिए।

आने वाले चुनावों पर असर?

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुद्दा उत्तर भारत के राज्यों खासकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में एक बार फिर धार्मिक भावनाओं को उद्वेलित करने का माध्यम बन सकता है।

यह मुद्दा धार्मिक आस्था और राजनीतिक रणनीति का एक मिश्रण बन गया है, जिसमें हर पार्टी अपनी भूमिका तय करने की कोशिश में लगी हुई है

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कांग्रेस को दिया गया यह खुला चैलेंज केवल एक बयान नहीं बल्कि आने वाले राजनीतिक और सामाजिक विमर्श की दिशा को दर्शाने वाला संकेत है। मथुरा जैसे आस्था से जुड़े मुद्दे देश की न्यायिक प्रणाली से लेकर जनभावनाओं तक व्यापक असर डालते हैं।

अब देखना यह होगा कि कांग्रेस इस चुनौती को स्वीकार कर कोर्ट में हलफनामा देती है या नहीं, और इससे आने वाले चुनावी समीकरणों पर क्या असर पड़ता है।

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